
अन्ना को चाहिए आपका समर्थन......!देशहित में दे अपना समर्थन
चारों ओर एक ही आवाज़ थी, अन्ना हमारा नेता है, अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है, अन्ना हजारे नहीं यह आंधी है, देश का दूसरा गांधी है, जैसे कई नारे अभी भी कानों में कोलाहाल मचा रहे हैं, यह नारा 5 अप्रैल को अन्ना के अनशन पर बैठने के बाद देश के चारों कोने से आने शुरू हो गए थे, देश की जनता चारों ओर से अन्ना के समर्थन में पुरे देश भर में धरना व प्रदर्शन कर रही थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के साथ-साथ देश की जनता को भी विरोध का एक अच्छा मंच मिल गया था। लगातार जंतर-मंतर पर लोगों की भीड़ दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा था और ऐसा होना स्वाभाविक भी था और तो और फोन पर, मोबाईल पर मैसेज के द्वारा, इंटरनेट पर भी कई माध्यमों से लोग अन्ना का समर्थन कर रहे थे, बालीवुड से लेकर देश के बाहर भी निवास करने वाले लोग अनेक देशों में अन्ना के समर्थन में खुल कर सामने आ रहे थे और ऐसा लग रहा था मानों एक बार फिर से हम अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं ंऔर अपना हक मांग रहे हैं। मैं भी लगातार कई न्यूज चैनलों के माध्यम से लगातार अन्ना के आंदोलन से जुड़ा हुआ था और देश के अलग-अलग कोनों से आ रही अभिव्यक्ति को और लोगों के विचारों को सुन रहा था और यह समझने लगा था कि अब जल्द ही या तो सरकार को खुद ही कुर्सी छोड़नी पड़ेगी या फिर लोकपाल विधेयक को मंजुरी मिल जायेगी। लोकपाल बिल को लेकर सरकार ने आंदोलन के दो दिन बाद भरोसा तो दिलाया लेकिन आज सरकार जिस तरह के लोकपाल का मसौदा तैयार कर रही है, उसे लेकर कई तरह के संशय बरकरार है, आज लोकपाल विधेयक को लेकर सर्वदलीय बैठक होना है, जिसके बाद 16 अगस्त से जंतर-मंतर पर एक बार फिर से विरोध शुरू होगा और लोग फिर से भ्रष्ट सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे, तब सरकार क्या करेगी और नपुंसक के समान बैठा विपक्ष की क्या स्थिती होगी यह तो समय ही बताएगा, लेकिन देश में पूर्व के विभिन्न आंदोलनों ने यह तो जता ही दिया है कि देश में जब भी आंदोलन हुए हैं, और जो भी सरकार उस समय रही है, उसे जनता के आंदोलनों के प्रति झूकना ही पड़ा है और जैसा मेरा मानना है यह आंदोलन भी अपनी सफलता के शिखर पर जरूर पहुंचेगा।
जैसा की हमें पढ़ने को मिलता है और बताया जाता है कि देश की आजादी के समय भी कई क्रांतिकारियों ने व नेताओं ने जमकर आंदोलन किया था और लोगों में एक जागरूकता उत्पन्न कर दी थी और फिर लोग उनके पिछे-पिछे चल पड़ते थे, न जान की चिंता होती थी और ना ही घर-परिवार की बस चिंता थी तो केवल इतना ही कि कैसे देश को आजादी मिले और अंग्रेजों को भारत से खदेड़ भगाया जाये। तब महात्मा गांधी ने करो या मरो का नारा दिया तो कभी दांडी मार्च निकाल कर अंग्रेजों को चेताया कि जनता अब केवल और केवल आजादी चाहती है। कभी सुभाष बोस के तुम मुझे खुन दो मैं तुम्हें आजादी दुंगा के नारे पर लोग अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हो गए तो कभी भगत सिंह की शहादत ने लोगों में एक नया जोश व चेतना जागृत हुई और युवाओं ने जान पर खेल कर अंग्रेजों को चुनौती दी, तब के हालात कुछ और थे, तब देश में अंग्रेज काबिज थे और लोग उनसे मुक्ति चाहते थे। लेकिन आज तो अपने ही लोग है, लेकिन इसके बावजूद जनता जानती है कि भ्रष्टाचार ने देश को खोखला कर दिया है और इससे यदि जल्द ही मुक्ति ना मिली तो देश के विकास की स्थिती में कमी जरूर आयेगी।
इसके बाद हमें यह भी याद है कि 75 के दौरान जयप्रकाश नारायण के पिछे जिस तरह से जनता ने अपना विश्वास प्रकट किया और फिर चारों ओर छात्र आंदोलन शुरू हुये, इन सब आंदोलनों ने यह जरूर साबित कर दिया है कि देश की जनता शांत बैठने वाली नहीं है, उसे केवल एक मार्गदर्शक चाहिए बाकि वह स्वयं भी भ्रष्ट लोकतंत्र, भ्रष्ट सरकार व नेताओं को उखाड़ फेंकने लायक है।
आज जो स्थिति है और जिस तरह देश की जनता ने अन्ना हजारे के एक छोटे से आंदोलन को शिखर तक पहुंचाया है और जिस गति से जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुटता दिखाई है, वह अब जल्द ही 16 अगस्त को जंतर - मंतर पर नज़र आएगा।
लोकपाल विधेयक व भ्रष्टाचार के प्रति बन रहे कठोर विधेयक के प्रति मेरा समर्थन भी अन्ना के साथ है।
जय हिन्द - जय भारत वंदे मातरम्!
अंचल ओझाप्रधान संपादक युवा मत हिन्दी मासिकमो. 9691066601
चारों ओर एक ही आवाज़ थी, अन्ना हमारा नेता है, अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है, अन्ना हजारे नहीं यह आंधी है, देश का दूसरा गांधी है, जैसे कई नारे अभी भी कानों में कोलाहाल मचा रहे हैं, यह नारा 5 अप्रैल को अन्ना के अनशन पर बैठने के बाद देश के चारों कोने से आने शुरू हो गए थे, देश की जनता चारों ओर से अन्ना के समर्थन में पुरे देश भर में धरना व प्रदर्शन कर रही थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के साथ-साथ देश की जनता को भी विरोध का एक अच्छा मंच मिल गया था। लगातार जंतर-मंतर पर लोगों की भीड़ दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा था और ऐसा होना स्वाभाविक भी था और तो और फोन पर, मोबाईल पर मैसेज के द्वारा, इंटरनेट पर भी कई माध्यमों से लोग अन्ना का समर्थन कर रहे थे, बालीवुड से लेकर देश के बाहर भी निवास करने वाले लोग अनेक देशों में अन्ना के समर्थन में खुल कर सामने आ रहे थे और ऐसा लग रहा था मानों एक बार फिर से हम अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं ंऔर अपना हक मांग रहे हैं। मैं भी लगातार कई न्यूज चैनलों के माध्यम से लगातार अन्ना के आंदोलन से जुड़ा हुआ था और देश के अलग-अलग कोनों से आ रही अभिव्यक्ति को और लोगों के विचारों को सुन रहा था और यह समझने लगा था कि अब जल्द ही या तो सरकार को खुद ही कुर्सी छोड़नी पड़ेगी या फिर लोकपाल विधेयक को मंजुरी मिल जायेगी। लोकपाल बिल को लेकर सरकार ने आंदोलन के दो दिन बाद भरोसा तो दिलाया लेकिन आज सरकार जिस तरह के लोकपाल का मसौदा तैयार कर रही है, उसे लेकर कई तरह के संशय बरकरार है, आज लोकपाल विधेयक को लेकर सर्वदलीय बैठक होना है, जिसके बाद 16 अगस्त से जंतर-मंतर पर एक बार फिर से विरोध शुरू होगा और लोग फिर से भ्रष्ट सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे, तब सरकार क्या करेगी और नपुंसक के समान बैठा विपक्ष की क्या स्थिती होगी यह तो समय ही बताएगा, लेकिन देश में पूर्व के विभिन्न आंदोलनों ने यह तो जता ही दिया है कि देश में जब भी आंदोलन हुए हैं, और जो भी सरकार उस समय रही है, उसे जनता के आंदोलनों के प्रति झूकना ही पड़ा है और जैसा मेरा मानना है यह आंदोलन भी अपनी सफलता के शिखर पर जरूर पहुंचेगा।
जैसा की हमें पढ़ने को मिलता है और बताया जाता है कि देश की आजादी के समय भी कई क्रांतिकारियों ने व नेताओं ने जमकर आंदोलन किया था और लोगों में एक जागरूकता उत्पन्न कर दी थी और फिर लोग उनके पिछे-पिछे चल पड़ते थे, न जान की चिंता होती थी और ना ही घर-परिवार की बस चिंता थी तो केवल इतना ही कि कैसे देश को आजादी मिले और अंग्रेजों को भारत से खदेड़ भगाया जाये। तब महात्मा गांधी ने करो या मरो का नारा दिया तो कभी दांडी मार्च निकाल कर अंग्रेजों को चेताया कि जनता अब केवल और केवल आजादी चाहती है। कभी सुभाष बोस के तुम मुझे खुन दो मैं तुम्हें आजादी दुंगा के नारे पर लोग अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हो गए तो कभी भगत सिंह की शहादत ने लोगों में एक नया जोश व चेतना जागृत हुई और युवाओं ने जान पर खेल कर अंग्रेजों को चुनौती दी, तब के हालात कुछ और थे, तब देश में अंग्रेज काबिज थे और लोग उनसे मुक्ति चाहते थे। लेकिन आज तो अपने ही लोग है, लेकिन इसके बावजूद जनता जानती है कि भ्रष्टाचार ने देश को खोखला कर दिया है और इससे यदि जल्द ही मुक्ति ना मिली तो देश के विकास की स्थिती में कमी जरूर आयेगी।
इसके बाद हमें यह भी याद है कि 75 के दौरान जयप्रकाश नारायण के पिछे जिस तरह से जनता ने अपना विश्वास प्रकट किया और फिर चारों ओर छात्र आंदोलन शुरू हुये, इन सब आंदोलनों ने यह जरूर साबित कर दिया है कि देश की जनता शांत बैठने वाली नहीं है, उसे केवल एक मार्गदर्शक चाहिए बाकि वह स्वयं भी भ्रष्ट लोकतंत्र, भ्रष्ट सरकार व नेताओं को उखाड़ फेंकने लायक है।
आज जो स्थिति है और जिस तरह देश की जनता ने अन्ना हजारे के एक छोटे से आंदोलन को शिखर तक पहुंचाया है और जिस गति से जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुटता दिखाई है, वह अब जल्द ही 16 अगस्त को जंतर - मंतर पर नज़र आएगा।
लोकपाल विधेयक व भ्रष्टाचार के प्रति बन रहे कठोर विधेयक के प्रति मेरा समर्थन भी अन्ना के साथ है।
जय हिन्द - जय भारत वंदे मातरम्!
अंचल ओझाप्रधान संपादक युवा मत हिन्दी मासिकमो. 9691066601